इंसानों को मौत बांट रहे जंगली जानवर, राजधानी देहरादून भी नहीं है सुरक्षित

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भारत में मानव और वन्यजीवों के मध्य संघर्ष निरंतर बढ़ता जा रहा है। जिसकी कीमत लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। जंगली जानवरों के हमले में मरने वालों की संख्या प्रतिवर्ष करीब 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। जिससे चिंता के बादल गहराते जा रहे हैं।
भारत में विकास के आयाम जिस तरह से पर्यावरण के लिए चुनौती साबित हो रहे हैं, तो वहीं वन्यजीवों के समक्ष मानवों के जीवन को रक्षित करना भी कठिन कार्य दिखाई पड़ रहा है। राष्ट्रीय अपराध संख्या ब्यूरो की ओर से जारी किए गए आंकड़ों को देखें तो गत वर्ष इंसानी इलाकों में जंगली जानवरों की गतिविधियां बड़ी हैं। फलस्वरुप उनके हमले भी बड़ी तादाद में हुए। जिसमें 1510 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। जबकि इससे पूर्व के वर्ष में यह संख्या 1264 थी। हमले का शिकार बने लोगों में 1205 पुरुष और 305 महिलाएं थीं। 45 से 60 वर्ष के आयु वर्ग में मरने वालों की संख्या सर्वाधिक 484 थी। जिनमें 378 पुरुष और 106 महिलाएं शामिल थी। जंगली जानवरों के हमले वाले राज्यों की बात की जाए तो महाराष्ट्र में 225 लोगों की मौत वन्यजीवोंं के हमले में हुई। तो वहीं, दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है, जहां 182 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद उड़ीसा में 144, तमिलनाडु में 138 और छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में क्रमशः 114 और 113 लोगों की हमले में मौत हुई।
उत्तराखंड में भी मानव और वन्य जीवों के बीच हो रहा संघर्ष चरम पर दिखाई पड़ता है। अगर विगत 5 वर्षों के आंकड़े देखे जाएं। तो यह हैरत में डालते हैं। जिसमें करीब 330 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और 1350 से ज्यादा लोग जंगली जानवरों के हमले में घायल हुए। राज्य में बाघ,भालू, हाथी, तेंदुआ, सूअर और अन्य जानवरों के हमले की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। सबसे ज्यादा हमले तेंदूये की ओर से देखने को मिले हैं। तेंदूये के हमले में 5 सालों में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। तो वहीं 50 से अधिक लोगों को हाथियों ने मार डाला। अगर राज्य बनने के बाद की बात की जाए तो जंगली जानवरों की ओर से किए गए हमलों में अब तक 1100 लोग अपनी जान गवां चुके हैं और करीब 5500 घायल हुए हैं। मनुष्य और जानवरों के बीच हो रहे इस संघर्ष के पीछे जंगली जानवरों के क्षेत्र में मानव बस्तियों की बढ़ रही संख्या प्रमुख कारण है। जिसके चलते वन क्षेत्र सिकुड़ रहा है और वन्य जीव दिन प्रतिदिन खूंखार हो रहे हैं और इसके चलते ही इंसानों की जान पर आफत आन पड़ी है। इससे खतरनाक बने प्राणी इंसानों की जान ले रहे हैं। मनुष्य की और से पाले जाने वाले पशुधन की जंगली क्षेत्रों में अत्यधिक चराई भी समस्या का कारण बन रही है। वनों को बड़े पैमाने पर कटाई हालत को चिंता जनक बना रही है और कृषि क्षेत्रों का वन क्षेत्रों में विस्तार लोगों की जान पर भारी पड़ रहा है।
नेशनल वाइल्डलाइफ एक्शन प्लान के अनुसार जलवायु परिवर्तन के परिणाम स्वरूप वन्य जीव प्रजातियों को अधिक अनुकूल आवास महिया करने की जरूरत है। वर्तमान में भारत में वन्य जीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्र के रूप में केवल पांच प्रतिशत भूमि ही आवंटित है। परंतु यह सुरक्षित क्षेत्र भी अक्सर घनी आबादी वाली बस्तियों से घिरे होते हैं। ऐसे में मनुष्य और जानवरों के बीच संघर्ष की संभावना सदैव विद्यमान रहती है और हजारों मामले प्रतिवर्ष दर्ज किया जाते हैं। ऐसे में इन इलाकों में रहने वाले लोगों में जानवरों के साथ रहने की समझ और सतर्कता का आयाम विकसित करने की आवश्यकता है।

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