बढ़ने लगा मानव वन्य जीव संघर्ष, राजधानी दून में भी दस्तक देने लगे गुलदार

  1. दहरादून से सटे वन क्षेत्र वन्यजीवों के कुदरती आवास रहे हैं, लेकिन पिछले काफी समय से यहां होटल, रेस्टोरेंट, कैफे, रिजॉर्ट आदि की भरमार बढ़ती जा रही है, जिससे तेंदुए जैसे जानवर के समक्ष संकट उत्पन्न हो गया। नतीजतन, वह अन्यत्र प्रस्थान को मजबूर होने से दून के घनी आबादी वाले इलाकों में चहलकदमी करता दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड के दुरस्त इलाको की तरह अब राजधानी देहरादून। में भी में इन दिनों बाघ और गुलदार के हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। प्रदेश में नए साल की शुरुआत में ही अब तक तीन लोग मारे जा चुके हैं और 7 लोग घायल हो चुके हैं। इस मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वन विभाग के अधिकारियों को चेतावनी दी है और कहा है कि वन विभाग के अधिकारी और अधिक सक्रिय हो जाएं। आपको बता दें कि उत्तराखंड में अक्सर बाघ और गुलदार के हमले में कई जगह लोगों की मौत होती है। प्रदेश में हर साल दर्जनों लोग गुलदार और बाघ के हमले में मारे जाते हैं। इस समय हालात ऐसे हैं कि अब तक नए साल की शुरुआत में ही 3 लोग बाघ और गुलदार के हमले में मारे जा चुके हैं 7 लोग घायल हुए हैं। विकट स्थिति ये हो गई है कि राजधानी देहरादून में अब शहरी इलाकों में भी गुलदार की दहशत बढ़ रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विगत दिवस वन विभाग के अधिकारियों के साथ मीटिंग कर उन्हें 24 घंटे निगरानी रखने के निर्देश दिए। अगले दिन वन विभाग में एक हाई पावर मीटिंग बुलाई गई, जिसमें फॉरेस्ट के चीफ अनूप मलिक और फॉरेस्ट वाइल्डलाइफ चीफ समीर सिन्हा समेत सभी आला अधिकारी मौजूद रहे। इस बैठक में सभी डीएफओ भी वर्चुअल माध्यम से जुड़े रहे। बैठक में निर्देश दिए गए कि जिलों में अगर घटनाएं हो रही हैं तो उन पर निगरानी रखी जाए पेट्रोलिंग ज्यादा से ज्यादा बढ़ाई जाए। कैमरा ट्रैप में जहां बाघ की हरकत दिख रही है वहां पिंजरा लगाकर उसे पकड़ने की कोशिश की जाए। अधिकारियों का कहना है कि ठंड के इस मौसम में जब विजिबिलिटी कम होने लगती है। इसका फायदा बाघ और गुलदार उठाते हैं। जिसका फायदा उठाकर कई बार वह इंसानी बस्तियों की ओर भी रुख करते हैं। फॉरेस्ट के अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वह बाघ और गुलदार के मूवमेंट पर पूरी नजर रखें। रात में भी पेट्रोलिंग बढ़ाई गई है। हालांकि उत्तराखंड में मानव वन्य जीव संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बाघ और गुलदार अब लगातार रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं। अभी तक पहाड़ों में अक्सर मानव वन्य जीव संघर्ष की तस्वीर सामने आ रही थी, लेकिन अब मैदानी इलाकों में भी परेशानियां बढ़ रही हैं।

 

उत्तराखंड में मानव वन्य जीव संघर्ष

साल 2011 में 204 घायल और 50 मौत

साल 2012 में 226 घायल और 51 मौत

साल 2013 में 288 घायल और 52 मौत

साल 2014 में 347 घायल और 52 मौत

साल 2015 में 311 घायल और 62 मौत

साल 2016 में 340 घायल और 66 मौत

साल 2017 में 249 घायल और 39 मौत

साल 2018 में 239 घायल और 52 मौत
साल 2019 में 260 घायल और 58 मौत

साल 2020 में 324 घायल और 67 मौत

साल 2021 में 361 घायल और 71 मौत

साल 2022 में 325 घायल और 82 मौत

साल 2023 में 300 घायल और 65 मौत

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